इमाम हुसैन

कुछ लोग मानते हैं हुसैन (RA) ने सत्ता के लिए युद्ध किया। मुमकिन है कि शायद उन्होंने कभी दिमाग़ का इस्तेमाल न किया हो।
चलिए मैं short cut में कहानी सुनाता हुँ। इमाम हुसैन (RA) अपने कुछ दोस्तों और परिवारवालों के साथ कूफ़ा के लिए रवाना हुए। काफिले के कुछ महत्वपूर्ण लोग निम्नलिखित थे:
1. इमाम हुसैन इब्न अली
2. अब्बास इब्न अली
3. क़ासिम इब्न हसन
4. अली अकबर इब्न हुसैन
5. अली असगर इब्न हुसैन (5 माह)
6. सकीना बिन्त हुसैन (6 वर्ष)
7. ज़ैनब बिन्त अली
8. औन इब्न अब्दुल्ला इब्न जाफर
9. मुहम्मद इब्न अब्दुल्ला इब्न जाफर

कूफ़ा जाने से पहले वह मक्का हज करने गए। लेकिन जब मक्का में उन्हें पता चला कि यज़ीद ने उन्हें क़त्ल करने के लिए क़ातिलों को मक्का भेजा है तब उन्होंने उमरा किया और मक्का से रवाना हो गए। उनका मनना था कि मक्का अल्लाह का घर है और वह नहीं चाहते थे कि वहाँ जंग हो और ख़ून बहे।

अगर वह सत्ता चाहते तो इस बात का ऐलान वहाँ(मक्का में) कर सकते थे और पूरी दुनिया के मुसलमानों की मौजूदगी में ख़लीफ़ा भी बन सकते थे। लेकिन वह उस अली (RA) के बेटे थे जिन्होंने कहा था “पूरे अरब की हुक़ूमत मेरे सामने एक मेमने की छींक से बढ़कर कुछ भी नहीं।”

बहरहाल उमरा कर के वह कूफ़ा के लिए रवाना हुए। कूफ़ा से कुछ मील पहले ही हुर्र इब्न यज़ीद अल-तमीमी ने हज़ारों की फ़ौज के साथ आकर उनका रास्ता रोक दिया। हुर्र ने इमाम (RA) को मजबूर किया अपना रास्ता बदलने को और फिर वो वहाँ से रवाना हुए क़र्बला की तरफ।

जब इमाम (RA) अपने काफ़िले के साथ क़र्बला पहुँचे उसके अगले ही दिन साद इब्न अबी वक्कास अपनी सेना के साथ कूफ़ा से वहाँ आ पहुंचा। बाद में हुर्र भी अपनी सेना के साथ वहाँ आ पहुँचे।

जंग से पहले वाली रात हुर्र अपनी आँखों पर पट्टी बांधे अपने बेटे के साथ हुसैन (RA) के ख़ेमे में आया और उनका रास्ता रोकने के लिए माफ़ी माँगी, फिर उनकी तरफ से सबसे पहले जंग में जाने की इज़ाज़त। इन दो शख़्स के अलावा और लोग भी थे जो यज़ीद की सेना छोड़ कर हुसैन (RA) की तरफ़ आ गए। हालाँकि इन्हें मालूम था कि अगले दिन जंग होगी और ये सभी लोग शहीद हो जायेंगे।

हुसैन (RA) शहीद होकर भी आने वाली तमाम नस्लों को बहुत कुछ सिखा गए।

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