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फ़ातिमा शैख़

Dilip C Mandal बाबू लिखते हैं कि महिला स्कूल खोलने वाली सावित्री बाई फूले का साथ देने वाली फ़ातिमा शेख को नायिका के तौर पर मुसलमानो को स्थापित करना चाहिए था |

मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। “फ़ातिमा शैख़ मुसलमानों की और सावित्रीबाई दलितों की” ऐसा सोचना इन दोनों महिलाओं का अपमान है। इन्होंने अपने वक़्त में ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ जिहाद किया। मेरा यक़ीन है कि इन्होंने जाति या धर्म के चश्मे से देखकर ऐसा नहीं किया होगा बल्कि दलितों पर होने वाले ज़ुल्म से लड़ने के लिए इल्म को हथियार बनाया।

यह तो मौजूदा वक़्त की विडंबना है कि कुछ ख़ुदगर्ज़ और कमज़र्फ़ लोग सावित्रीबाई को दलितों की और फ़ातिमा शैख़ को मुसलमानों की जागीर बनाने पर तुले हैं।