आत्मग्लानि

हे आर्य !
तुम अपने पूर्वजों के
बेइन्तहां किये ज़ुल्मों पर
रचते हो छंदबद्ध कविता और महाकाव्य
और करते हो
उनके काले नियमों का
महिमामंडन.
बस समझते हो कि तुम्हारे पूर्वजों
की विरासत ही है भारतीय संस्कृति
तो हम पूछते हैं कि हम
आदिवासियों, हूणों, शकों, संथालों, भीलों,
दलितों, मुसलमानों, सिखों, बौद्धों इत्यादि
की संस्कृतियों का क्या स्थान है
तुम्हारी तथाकथित भारतीय संस्कृति में ?
तुम हमारे दुःख- दर्द क्या समझोगे ?
पूछो उनसे उनका दर्द –
जिनके पूर्वजों के कान में दग्ध सीसा
उडेला गया वेद सुनने के अपराध में
पूछो उनसे उनका दर्द
जिनकी नियति में पीढ़ी डर पीढ़ी
ग़ुलामी लिख दी गयी
पूछो उनसे उनका दर्द
जिन्हें इन्सान तो क्या जानवर से भी नीच
समझा गया
पूछो उनसे उनका दर्द
जिनके पूर्वज तुम्हारे ज़ुल्मों से
तंग आ कर बुद्ध और मुहम्मद की शरण में गए
और जिन्हें आज भी तुम विदेशी म्लेच्छ कह देते हो
तुम्हें ये सब जानकर भी क्या कभी आत्मग्लानि नहीं हुयी ?

– अदनान कफ़ील

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