Install WordPress on Nginx

Download latest wordpress code:

Extract files:

Copy all extracted files to /var/www/html folder:

Change directory to /var/www/html folder:

Change group and owner of all files to www-data:

Create MySQL user for mysite.com:

Create wp-config.php file and update as per above details.

To create a virtual host please follow this post

SSL Setup on Nginx Server

To add https support on your website you need to follow these steps:

Get the SSL certificate

There are various vendors from which you can buy SSL certificate. If you want to generate self signed SSL certificate instead of buying it, please execute below command:

Add -nodes in the above command if you do not want to set any passphrase for your private key.

Copy certificate to right location

Once the certificate is generated copy it to /etc/ssl/ folder on your server.

Update virtual host file

Open your virtual host config file ( /etc/nginx/sites-enabled/your_site.conf):

फ़ातिमा शैख़

Dilip C Mandal बाबू लिखते हैं कि महिला स्कूल खोलने वाली सावित्री बाई फूले का साथ देने वाली फ़ातिमा शेख को नायिका के तौर पर मुसलमानो को स्थापित करना चाहिए था |

मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। “फ़ातिमा शैख़ मुसलमानों की और सावित्रीबाई दलितों की” ऐसा सोचना इन दोनों महिलाओं का अपमान है। इन्होंने अपने वक़्त में ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ जिहाद किया। मेरा यक़ीन है कि इन्होंने जाति या धर्म के चश्मे से देखकर ऐसा नहीं किया होगा बल्कि दलितों पर होने वाले ज़ुल्म से लड़ने के लिए इल्म को हथियार बनाया।

यह तो मौजूदा वक़्त की विडंबना है कि कुछ ख़ुदगर्ज़ और कमज़र्फ़ लोग सावित्रीबाई को दलितों की और फ़ातिमा शैख़ को मुसलमानों की जागीर बनाने पर तुले हैं।

इमाम हुसैन

कुछ लोग मानते हैं हुसैन (RA) ने सत्ता के लिए युद्ध किया। मुमकिन है कि शायद उन्होंने कभी दिमाग़ का इस्तेमाल न किया हो।
चलिए मैं short cut में कहानी सुनाता हुँ। इमाम हुसैन (RA) अपने कुछ दोस्तों और परिवारवालों के साथ कूफ़ा के लिए रवाना हुए। काफिले के कुछ महत्वपूर्ण लोग निम्नलिखित थे:
1. इमाम हुसैन इब्न अली
2. अब्बास इब्न अली
3. क़ासिम इब्न हसन
4. अली अकबर इब्न हुसैन
5. अली असगर इब्न हुसैन (5 माह)
6. सकीना बिन्त हुसैन (6 वर्ष)
7. ज़ैनब बिन्त अली
8. औन इब्न अब्दुल्ला इब्न जाफर
9. मुहम्मद इब्न अब्दुल्ला इब्न जाफर

कूफ़ा जाने से पहले वह मक्का हज करने गए। लेकिन जब मक्का में उन्हें पता चला कि यज़ीद ने उन्हें क़त्ल करने के लिए क़ातिलों को मक्का भेजा है तब उन्होंने उमरा किया और मक्का से रवाना हो गए। उनका मनना था कि मक्का अल्लाह का घर है और वह नहीं चाहते थे कि वहाँ जंग हो और ख़ून बहे।

अगर वह सत्ता चाहते तो इस बात का ऐलान वहाँ(मक्का में) कर सकते थे और पूरी दुनिया के मुसलमानों की मौजूदगी में ख़लीफ़ा भी बन सकते थे। लेकिन वह उस अली (RA) के बेटे थे जिन्होंने कहा था “पूरे अरब की हुक़ूमत मेरे सामने एक मेमने की छींक से बढ़कर कुछ भी नहीं।”

बहरहाल उमरा कर के वह कूफ़ा के लिए रवाना हुए। कूफ़ा से कुछ मील पहले ही हुर्र इब्न यज़ीद अल-तमीमी ने हज़ारों की फ़ौज के साथ आकर उनका रास्ता रोक दिया। हुर्र ने इमाम (RA) को मजबूर किया अपना रास्ता बदलने को और फिर वो वहाँ से रवाना हुए क़र्बला की तरफ।

जब इमाम (RA) अपने काफ़िले के साथ क़र्बला पहुँचे उसके अगले ही दिन साद इब्न अबी वक्कास अपनी सेना के साथ कूफ़ा से वहाँ आ पहुंचा। बाद में हुर्र भी अपनी सेना के साथ वहाँ आ पहुँचे।

जंग से पहले वाली रात हुर्र अपनी आँखों पर पट्टी बांधे अपने बेटे के साथ हुसैन (RA) के ख़ेमे में आया और उनका रास्ता रोकने के लिए माफ़ी माँगी, फिर उनकी तरफ से सबसे पहले जंग में जाने की इज़ाज़त। इन दो शख़्स के अलावा और लोग भी थे जो यज़ीद की सेना छोड़ कर हुसैन (RA) की तरफ़ आ गए। हालाँकि इन्हें मालूम था कि अगले दिन जंग होगी और ये सभी लोग शहीद हो जायेंगे।

हुसैन (RA) शहीद होकर भी आने वाली तमाम नस्लों को बहुत कुछ सिखा गए।